सारांश
अर्जुन शर्मा, यामनाका इस्पात के ठंडे दफ्तर में रोजाना काम करता था, और वह कभी भी दृढ़ता से उत्तर देने के बजाय हमेशा अस्पष्ट शब्दों का प्रयोग करता रहता था। विवाहेतर साथी रीमा भी उससे पूछती रहती थी, "तुम कब अपनी पत्नी से अलग हो जाओगे?" लेकिन वह हमेशा मामूली जवाब देकर सवाल टाल देता था।
एक दिन, लेखा विभाग के मीटिंग कक्ष में आय-व्यय की रिपोर्ट देते समय अचानक मोबाइल की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर रीमा का नाम दिखते ही, अर्जुन शर्मा का दिल एक पल के लिए जम सा गया। फोन पर रीमा ने अत्यंत गंभीर स्वर में कहा, "अब मैं तुम्हारी पत्नी के पास जा रही हूँ।"
घबराए हुए अर्जुन शर्मा तुरंत मीटिंग कक्ष से बाहर दौड़ पड़े, जहाँ उनकी मुलाकात उनकी पत्नी से हुई, जिनके चेहरे पर न तो गुस्सा था और न ही दुःख, केवल एक अचंभित शांति थी।
उन्होंने शांत स्वर में कहा, "तुम्हारा अस्पष्ट व्यवहार वास्तव में उस कंपनी द्वारा संचालित मनोवैज्ञानिक प्रयोग का एक हिस्सा था। रीमा तुम्हारी प्रतिक्रिया देखने के लिए सहयोगी थी, और तुम स्वयं डेटा के रूप में प्रयोग किए जाने वाले परीक्षण विषय थे।" उस एक वाक्य ने अर्जुन शर्मा के दिल में गहरा झटका पहुँचा।
उन्हें एहसास हुआ कि उनका जीवन, निर्णय के एक भ्रांति में नियंत्रित किया जा रहा था, और भय व निराशा के बावजूद सच्चाई को स्वीकार करना पड़ा। प्रयोग रिपोर्ट में, उनकी प्रविष्टि केवल "निर्णायक पुरुष" के नाम से दर्ज की गई थी, जो भविष्य में अदृश्य हो जाने वाली नियति का बीज बन गई।
इस प्रकार, अर्जुन शर्मा अपनी अस्पष्ट जीवनशैली के कारण आए विडंबनापूर्ण परिणाम में, हमेशा के लिए नियंत्रित एक अस्तित्व बनकर अंधकार में विलीन हो गए।

















































