सारांश
अरविंद सिंह को एक ऐसे पुलिस अधिकारी के रूप में जाना जाता था, जो झूठ सहन नहीं करता था और अपने अडिग न्याय के कारण शहर की शांति बनाए रखने वाले थे। हाल ही में, शहर में 'कानाजुची डाकू' के नाम से एक घटना की अफवाह फैल रही थी, जिसके खिलाफ वह कार्रवाई में जुटे थे। एक बारिश के बाद की शाम, उन्होंने एक बिजली के खंभे के नीचे अकेले एक आदमी को देखा। वह व्यक्ति हाथ में कानाजुची लेकर खंभे पर चढ़ा हुआ था और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह छत की मरम्मत कर रहा है, लेकिन अरविंद की नजर में कुछ संदेह के लक्षण थे।
एक पल में लिए गए अतिसंक्षिप्त निर्णय और पुराने दर्दनाक अनुभव ने उन्हें प्रेरित किया, और उन्होंने उस व्यक्ति को ही झूठ बोलने वाला डाकू मानकर बिना किसी दया के उसे नीचे खींचने की कोशिश की। अचानक हुए संघर्ष में वह व्यक्ति संतुलन खो बैठा, और अंततः वह एक भयानक गिरावट का शिकार हो गया, जिससे उस स्थान पर सन्नाटा छा गया। बाद में हुई जांच से यह पता चला कि वह व्यक्ति वास्तव में एक भरोसेमंद स्थानीय कारीगर था, जो पुरानी छत की मरम्मत में जुटा हुआ था।
इस घटना के प्रभाव से पूरे शहर में हलचल मच गई, और अरविंद के भीतर छुपा अतीत - जिसमें उन्होंने एक बार अपनी ग़लतफहमी के कारण किसी की जान गंवाई थी - फिर से जागृति पकड़ने लगा। उनका न्याय के प्रति जुनून उन्हें अपने अंधेरे अतीत का सामना करने पर मजबूर कर रहा था, और वे निरंतर स्वयं को दोषी ठहराते रहे। रात की खामोशी में, उनके कानों में धीरे से एक शब्द गूंजा, "जो पीछा करता है, कभी न कभी उसका भी पीछा किया जाएगा।" उसी क्षण, न्याय, ग़लतफहमी और छुपे हुए रहस्य आपस में मिलकर एक तीखी विडंबनापूर्ण तकदीर के पहिये की तरह बिना किसी शोर के घूमने लगे।

















































