मानवमुखी घास

2025/3/26

मानवमुखी घासकी छवियाँ

सारांश

एक रात, अनिता शर्मा, अपनी दादी द्वारा देखे गए एक स्वप्न से प्रेरित होकर, अपने दादा रमेश शर्मा के बसे पहाड़ी गाँव की ओर अग्रसर हुई। रास्ते में, मद्धम अंधकार से ओत-प्रोत एक जंगल में अचानक प्रकट हुए एक विचित्र जुलूस के कारण उसकी चाल रुक गई। यह जुलूस, जो स्थानीय में 'दलदल-प्रस्थान' के नाम से जाना जाता था, भीगी हुई दलदली ओर बढ़ रहा था। जुलूस के अग्रभाग में, एक पुरुष था जिसने अपने सिर पर 'मानवमुखी घास' नामक, जिस पर इंसानी चेहरा तरसा हुआ था, को सजाया हुआ था। उसकी नज़रें इतनी ठंडी थीं, मानो वह जीवितों के दिल की गहराई तक झाँक सकता हो।

अनिता शर्मा ने भयभीत मन से उसका पीछा किया, और उस हल्की धुंध में लुप्त होते हुए जुलूस की छवि देखी, लेकिन वह कुछ ही पल में गायब हो गया। थोड़ी राहत के साथ-साथ बेचैनी से घिरी अनिता तुरंत अपने दादा के घर की ओर दौड़ी। जब वह घर पहुँची तो पुराने और स्नेहिल माहौल में खुद को पाकर भी, उसने जो हाल ही में हुआ वर्णन किया, उससे रमेश शर्मा के चेहरे पर चिंता की लकीर साफ दिखाई देने लगी, जिसे वे छुपा नहीं सके।

रमेश शर्मा ने शांत स्वर में बोलना शुरू किया। उन्होंने बताया कि कई वर्षों पहले उन्हें भी उसी 'दलदल-प्रस्थान' के जुलूस का सामना करना पड़ा था, और उस समय उन्होंने एक स्वप्न में अपनी प्रिय पत्नी – अनिता की दादी – की छवि तथा 'मानवमुखी घास' का अद्भुत संगम देखा था। युवा अवस्था में, उन्होंने एक गुप्त अनुष्ठान के तहत, अपनी आक्रोश की शांति के लिए मैदान में 'मानवमुखी घास' बो दी थी, जिसे किसी से साझा नहीं किया जा सकता था। परंतु यह क्रिया धीरे-धीरे एक श्राप में बदल गई, और बदले की मांग करने वाली भूतिया घटनाओं को आमंत्रित करने लगी।

जब रात और गहराई में डूब गई और हवाएँ गाँव को चीरते हुए चल पड़ीं, तो पुनः 'दलदल-प्रस्थान' का जुलूस रमेश शर्मा के घर के बाहर प्रकट हुआ। जुलूस के बीच से, सावधानी से फर्श पर एक मुरझाया हुआ फूल रख दिया गया और धुंध में दादी की छवि उभर कर आई, जिसने धीमी आवाज में फुसफुसाते हुए कहा, "इस गलती को पार करो, और नई रोशनी का स्वागत करो।" रमेश शर्मा की आँखों में आँसू उमड़ आए, मानो वर्षों से संजोए दुःख और छुपे रहस्य एक पल में ही खो गए हों।

कौन सोच सकता था कि वही 'मानवमुखी घास' और वह 'दलदल-प्रस्थान' का जुलूस, अतीत के पापों और भविष्य में मेलजोल का संदेशवाहक बन जाएंगे। अनिता शर्मा ने इस अप्रत्याशित भाग्य परिवर्तन का प्रत्यक्ष अनुभव किया और अपने परिवार पर थोपे गए श्राप से मुक्ति पाने के संकल्प के साथ एक नया कदम उठाने का निश्चय किया।


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