सारांश
सुरेश और रीमा अपने बच्चों के साथ एक शांत पहाड़ी शिविर स्थल की ओर प्रस्थान किए। पिता सुरेश ने अग्निकुंड के पास बैठकर समझाया कि जीवन निरंतर एक चक्र में घूमता रहता है, और उनके शब्द बच्चों के हृदयों में गहराई से उतर गए।
नदी के किनारे पहुँचते ही, सुरेश ने मछली पकड़कर उसे परिवार के साथ बाँटा और सभी ने मिलकर उसका स्वाद लिया। भोजन के बाद, पिता की कथा से प्रेरित होकर, बच्चों ने बचे हुए मछली की हड्डियों को बड़े ध्यान से एकत्रित किया और मानो एक छोटी कब्र बना रहे हों, उन्हें मिट्टी में दफन करना शुरू कर दिया। इस कृत्य में उन्होंने जीवन के प्रति श्रद्धा और एक रहस्यमयी अनुष्ठान की भावना महसूस की।
लेकिन उसी दोपहर, मासूम जिज्ञासा में खोए बच्चों ने जंगल की गहराइयों में प्रवेश कर लिया। अंधेरे वन में दौड़ते हुए अचानक तेज़ बंदूक की आवाज गूंज उठी, और शिकार पर लगे एक व्यक्ति ने गलती से अपने साथी को गोली मार गिराया – एक चौंकाने वाला दृश्य। भय और उलझन में, बच्चों को वहाँ से भागना पड़ा।
घर लौटने के बाद, गाँव में अफवाहें फैलने लगीं कि यह शिकार दुर्घटना कोई संयोग नहीं थी, बल्कि प्राचीन काल से चली आ रही ‘निषिद्ध खेल’ के कारण हुई थी। सुरेश ने गंभीर स्वर में बताया कि उस दिन, जब बच्चों ने मासूमियत से मछली की हड्डियों को कब्र की तरह दफन किया था, उन्होंने जंगल में सोए हुए निषिद्ध कारण-संबंध को जागृत कर दिया था। जंगल की सुनसानता और खोए हुए साथी की त्रासदी, प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करने का दंड बनकर लौट आई थी।
और फिर, जैसे-जैसे रात का अंधकार गहराया, बुझती हुई अग्निकुंड के पास सुरेश की आँखों में गहरी पीड़ा झलकने लगी। जंगल की लंबी परछाइयाँ मानो अचानक उनके भाग्य का संकेत देती हुई फैल गईं, यह बताते हुए कि उस गलत शॉट का दर्द प्रकृति में असावधानीपूर्वक हस्तक्षेप का कठोर दंड है। उसी पल परिवार ने समझ लिया कि उनकी मासूम खेल ने बंधा हुआ श्राप जागृत कर दिया था, और अनंत काल तक लौटने वाले भाग्य के चक्र को सक्रिय कर दिया था।

















































