सारांश
अमित वर्मा, जो रोज़ ऑफिस में रवि अग्रवाल द्वारा सार्वजनिक रूप से फटकारे सुनते हुए अपमान का सामना करता था, उसके पास एक ऐसा रहस्य था जिसे वह किसी को बता नहीं पाता था। हर रविवार, वह चुपचाप 'बदला क्लब' में जाता था, जहाँ अन्य पीड़ित हृदय इकठ्ठा होते थे और अपनी भीतरी क्रोध को दूसरों की क्रियाओं द्वारा शांत करने का अद्भुत संस्कार निभाया जाता था।
एक दिन, क्लब के नेता ने गंभीरता से घोषणा की, "आज का निशाना रवि अग्रवाल है"। एकत्रित साथी गुप्त योजनाएँ बनाने लगे और अंधेरों में बदले की तैयारी में जुट गए। जैसे ही रात की चादर फैलने लगी, अमित वर्मा ने धीरे-धीरे अपने हृदय के गहरे कोने में छिपी असहजता को महसूस करना शुरू किया, और अशांत वातावरण में बदले का मंचन तेज होने लगा, जिसके चलते वह अंततः रवि अग्रवाल के साथ आमने-सामने हो गया।
लेकिन, उस क्षण प्रकट हुआ एक चौंकाने वाला सच। रवि अग्रवाल की ठंडी निगाहों में न तो कोई बाहरी शत्रु था, बल्कि अमित वर्मा के भीतर जड़ें जमा चुकी क्रोध और निराशा का मूर्त रूप था। 'बदला क्लब' दरअसल अमित वर्मा द्वारा अपने अंधेरे मन का सामना करने के लिए उत्पन्न की गई एक भ्रांति थी। किसी को दंडित करने का कार्य अंततः स्वयं को नष्ट करने का मार्ग बन जाता है। अमित वर्मा उस सच्चाई से अभिभूत होकर, आंसुओं के साथ अपने आत्म-विनाश के चक्र को तोड़ने का संकल्प लेता है, और इसी के साथ क्लब के द्वार हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं।

















































