सारांश
स्मिता हमेशा संयमित कपड़ों में रहती थी ताकि वह भीड़ की निगाहों से बच सके। पर उसके अंदर एक ऐसा रहस्य था जिसे वह किसी से साझा नहीं कर पाई थी। जब भी उसकी तारीफ होती, उसके हाथ अनजाने में पास-पड़ोस की छोटी-छोटी वस्तुओं की ओर बढ़ जाते थे, जो कि उसकी एक अजीब आदत थी। बचपन से ही तारीफ के शब्दों ने उसके भीतर एक अनसुलझी प्यास जगाई थी, और धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति उसके नियंत्रण से बाहर हो गई।
एक दिन, स्मिता एक शांत कैफे में अनायास राहुल से मिली। राहुल ने अपने गर्मजोशी भरे और सच्चे शब्दों से स्मिता की विनम्रता की सराहना की। उसी क्षण, स्मिता के शरीर ने प्रतिक्रिया दी और उसके हाथ राहुल की मेज पर रखी एक छोटी पुरानी पेंडेंट की ओर बढ़ गए। बिना ध्यान दिए उसने वह पेंडेंट चुरा ली, जिसमें उसे अतीत की कुछ पुरानी यादें ताजा हो उठीं।
उस दिन के बाद, स्मिता को अपनी इस अजीब आदत का सामना करना पड़ा। राहुल ने बार-बार मधुर शब्दों से उसे आश्वस्त किया, फिर भी स्मिता ने महसूस करना शुरू किया कि उसके इस कार्य से एक रहस्यमय नियति की धारा प्रवाहित हो रही है। उसने जो वस्तुएँ चुराईं थीं, वे संयोग से एक ही विषय से संबंधित थीं, और कहा जा रहा था कि वे सभी एक प्रसिद्ध कलाकार द्वारा छोड़े गए खोए हुए खज़ाने का हिस्सा थीं।
जांच-पड़ताल करते हुए, स्मिता को एक चौंकाने वाला सच पता चला। असल में, उसके परिवार पर पीढ़ियों से 'सौंदर्य का श्राप' नामक एक रहस्यमयी अभिशाप मंडरा रहा था, जिसे तारीफ के शब्द सक्रिय कर देते थे। और राहुल, असल में, उस कलाकार का छिपा हुआ उत्तराधिकारी था जिसने जानबूझकर स्मिता के करीब आकर उसके अनजाने कर्मों से खोए हुए खज़ाने को वापस पाने की कोशिश की थी।
क्लाइमेक्स में, स्मिता ने उस अंतिम पेंडेंट पर उकेरी गई हल्की सी छाप को खोज निकाला, जो उसके परिवार के श्राप को तोड़ने की चाबी थी, और यह दिखा दिया कि उसकी अजीब आदत उसकी नियति बदलने की शक्ति रखती है। अंत में, राहुल ने शांति से कहा, "तुम्हारी यह आदत हमारे खोए हुए कला और पारिवारिक बंधन को पुनर्जीवित कर दी है।" स्मिता ने अपनी अजीब आदत से कभी शर्मिंदा नहीं हुई; बल्कि, उसने समझा कि यह ही उसके भविष्य की ओर बढ़ने वाला एक चमत्कार है, और उसने नये सफर की शुरुआत की।

















































