सारांश
बातें करने में माहिर, सुनने में कच्चा
एक गाँव में, एक ऐसा आदमी था जो सब से ज़्यादा बात करने में माहिर था, उसका नाम तارو था। वह किसी भी परिस्थिति में शानदार आत्म-प्रस्तुति और चतुर अभिव्यक्ति का उपयोग करके окружа को मंत्रमुग्ध कर देता था। गाँव के लोग उसे बोलने के लिए पसंद करते थे, लेकिन उन्होंने कभी उसे अपनी बात कहने का मौका नहीं दिया। क्योंकि तारो अपनी बात कहने में इतना मग्न रहता था कि दूसरों की बातें उसके कानों तक नहीं पहुँचती थीं।
एक दिन, गाँव के चौक पर "सुनने की शक्ति" थीम पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रशासनिक अधिकारी ने कहा कि गाँव के विकास के लिए सिर्फ बोलना ही नहीं, सुनने का भी महत्व है। लेकिन जब कार्यक्रम शुरू हुआ, तारा मंच पर खड़ा हो गया और अपने शानदार अनुभवों को सुनाने लगा। श्रोताओं ने एक बार में उत्साह दिखाया, लेकिन धीरे-धीरे उनकी रुचि कम होती गई और उन्होंने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया।
तारो को इसकी ख़बर नहीं हुई और उसने अपनी आवाज़ और ऊँची कर दी और बातचीत जारी रखी। इसी बीच, श्रोताओं में से एक, शिनो, खड़ा हो गया और चिल्लाया, "हमें भी अपने विचार कहने दीजिये!" लेकिन तारा ने उसे टोकते हुए कहा, "थोड़ा रुको, ये मेरी बातों की मज़ेदार होती है!" शिनो ने कंधे ऊँचाए और असहज चुप्पी में, अन्य लोग भी उसी तरह से उसे अचम्भित दृष्टि से देखने लगे।
आखिरकार, तारा उस माहौल में बिना तालियों के चुप हो गया। गाँव के लोगों ने देखा कि वह बात करने में माहिर है, लेकिन सुनने में उसकी कोई रुचि नहीं है, जिससे वे निराश हुए। तारा अपनी आत्म-संतोष के एकतरफा रवैये को समझे बिना, आगे भी "बात करने में माहिर, सुनने में कच्चा" के रूप में अलगाव में रह गया। उस घटना के बाद, गाँव के लोगों ने एक-दूसरे से बातचीत करने और सुनने का आनंद फिर से पहचाना और उनकी एकता और गहरी हो गई।






































































































































































































