सारांश
अजीब गाँव की सीख
बहुत समय पहले, एक गाँव में एक बहुत ही अजीब दादा जी रहते थे। दादा जी गाँव वालों को "जो तुम खुद नहीं चाहते, वह दूसरों को मत दो" की सीख देते थे। इस शिक्ष का मतलब है कि दूसरों को ऐसी चीज़ें नहीं करनी चाहिए जो उन्हें नापसंद हों। लेकिन दादा जी खुद इस शिक्ष को व्यवहार में लाने में बहुत अच्छे नहीं थे।
एक दिन, दादा जी ने गाँव के चौराहे पर तेज़ आवाज में चिल्लाया "मुझे तरबूज बिल्कुल पसंद नहीं हैं! इसलिए, तुम सब भी तरबूज मत खाना!" गाँव वाले पहले तो हैरान हुए, फिर धीरे-धीरे हंसने लगे। "तो फिर, दादा जी को खुद तरबूज खाना पड़ेगा!" एक युवक ने कहा। दादा जी शर्म के मारे नज़रें चुराने लगे, लेकिन गाँव वाले उनके इस रूप को देखकर ज़ोर से हंस पड़े।
रात को, गाँव वाले इकट्ठा हुए और दादा जी की न कर पाने वाली सीख की मज़ेदार बातों पर चर्चा की। फिर गाँव के तरबूज किसान ने कहा "तो फिर, कल हम सब मिलकर तरबूज पार्टी करते हैं!" गाँव वाले बहुत खुश हुए, और सभी ने तरबूज लाने की योजना बनाई। दादा जी ने भी सोचा कि कोई बात नहीं, और इसमें भाग लेने का फैसला किया।
अगले दिन, दादा जी ने तरबूज के सामने बैठकर सोचा "जो चीज़ मुझे नापसंद है, उसे खाना कितना मुश्किल है", लेकिन फिर भी उन्होंने एक कौर लिया। उस क्षण, मीठे और रस भरे स्वाद से वह चकित हो गए। "ओह, यह तो बुरा नहीं है!" दादा जी ने खुशी से हंसते हुए कहा। गाँव वालों ने यह दृश्य देखा और समझ गए कि दादा जी और उनकी सीख में कितना परिवर्तन आया है। इस तरह, गाँव और भी रोशन हो गया और "जो तुम खुद नहीं चाहते, वह दूसरों को मत दो" की सीख सिर्फ एक उपदेश नहीं रह गई, बल्कि मजेदार संवाद का एक जरिया बन गई।






































































































































































































