सारांश
बुराई की सजा
एक छोटे से गाँव में, नापाक चोर टकेशी रहता था। वह हर रात लोगों के घरों में चुपके से घुसकर सोने-चांदी की खजाने चुराने के लिए जाना जाता था। गाँव के लोग डर के मारे उसकी उपस्थिति पर नजरें चुराने लगते। लेकिन, टकेशी को उन बुराईयों में थोड़ी देर की खुशी मिल रही थी।
एक रात, टकेशी एक खास मूल्यवान खजाना प्राप्त करने के लिए गाँव के धनवान दादा जी के घर में चुपके से घुसने की योजना बना रहा था। दादा जी बच्चों को सुनाई जाने वाली पुरानी कहानियों के साथ शरबत पी रहे थे। उनके पास एक मछली के टैंक में तैर रहा एक सुनहरा मछली थी, जिसे वह बहुत प्रिय मानते थे। टकेशी ने उसे देखकर आँखें चमका दीं और मन में सोचा, "उस मछली को चुराकर मैं बड़ा माल बनाएँगा!"
लेकिन जब टकेशी टैंक के पास पहुँचा, तभी अचानक मछली ने रोशनी छोड़ दी, और जैसे ही उसने उसे छुआ, एक अनहोनी घटित हो गई। उसका शरीर सीसा की तरह भारी हो गया, और अचानक दादा जी के शब्द उसके कानों में गूंजने लगे, "जो बुराई करता है, उसे हमेशा उसकी सजा मिलती है।" उस शब्द को सुनते ही, टकेशी का एक पैर टैंक में समा गया, और वह मछली की तरह तैरने लगा।
गाँव वालों ने अगले दिन, टकेशी को टैंक में पाया। यह देखकर बच्चे हंसने लगे और बोले, "अब तुम मछली की तरह दादा जी की सुरक्षा में रहना!" टकेशी बुराई की सजा के रूप में हमेशा के लिए सुनहरी मछली बन गया, और उसे चोरी की गई चीजों की कीमत का पाठ पढ़ाने की भूमिका निभानी पड़ी। वास्तव में "बुराई का फल भोगना" यही होता है। वह उस दिन से किसी को भी नजर न आने, केवल एक साधारण सुनहरी मछली के रूप में जीना जारी रखने लगा।






































































































































































































