सारांश
बंदर की बुद्धि और मूर्खता का अंत
बहुत समय पहले, एक छोटे से गाँव में एक हमेशा नजर में रहने वाला बंदर रहता था। उसका नाम सर्ता था। सर्ता को गाँववालों के सामने अपनी बुद्धि दिखाना बहुत पसंद था, लेकिन वह हमेशा बड़ी गलतियों कर देता था। एक दिन, उसने गाँव के चौक पर "बुद्धि का मुकाबला" आयोजित करने का प्रस्ताव दिया। इस योजना में रुचि रखने वाले गाँववालों ने उत्साह से सर्ता को चुनौती देने का निर्णय लिया।
सर्ता अपनी बुद्धि को हथियार बनाकर गाँववालों पर विजय पाने के लिए बेताब था। उस दिन, उसने घमंड करते हुए "बंदर भी कर सकता है, ऐसा कठिन प्रश्न" प्रस्तुत किया। "चलो, क्या कोई मुझे इसका उत्तर दे सकता है?" उसने आत्मविश्वास से कहा। लेकिन, उसका प्रस्तुत किया हुआ कठिन प्रश्न वास्तव में सरल था, और इसने गाँववालों की बुद्धि की परीक्षा ली। गाँववालों ने सर्ता की धोखाधड़ी की और सभी सवालों को शानदार तरीके से हल कर दिया।
सर्ता ने कहा, "मैं तो बंदर हूँ, तुम लोगों पर तो मैं कभी जीत नहीं सकता," जबकि वह अपने दिल में सोच रहा था, "यही सबसे बड़ी बुद्धि है।" लेकिन, गाँववालों ने उसकी "बुद्धि" का मजाक उड़ाया, और अंततः सर्ता ने अपनी मूर्खता को समझा। उसकी बंदर की बुद्धि ने उलटकर उसे शर्मिंदा कर दिया।
इस तरह, सर्ता गाँव का मजाक बना और उसने अपनी "बुद्धि" पर अति आत्मविश्वास का मूर्खता सीखी। इसके बाद, गाँववालों ने "बंदर की बुद्धि" का इस्तेमाल करके सर्ता का मजाक उड़ाया और एक साथ हंसकर, बुद्धि और मूर्खता के बीच की सीमा को महसूस करते हुए दिन बिताए। और, सर्ता धीरे-धीरे विनम्रता सीखने लगा। लेकिन, जब भी गाँववाले उसे "बंदर" कहते, तब उनके दिलों में अंधेरे हास्य की एक आग जलती रहती।






































































































































































































