सारांश
फूल, पक्षी, हवा और चाँद के साथ अंधेरे का शिकारी
एक खूबसूरत वसंत की शाम, गाँव के चौक में रंग-बिरंगे फूल खिल उठे थे, और पक्षियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी। लोग उस दृश्य को देखकर खुश नजर आ रहे थे और हंसते-खेलते अपनी दैनिक थकान को भुला रहे थे। लेकिन, इस खुशी के पीछे, गाँव के एक कोने में एक अजीब अफवाह फैल रही थी। "अंधेरे का शिकारी" गांव वालों का निशाना बना रहा है।
इस शिकारी की विशेषता यह थी कि वह अपने लक्षित शिकार को "फूल" के रूप में देखता था और उनकी जान ले लेता था। यह मानो प्राकृतिक सुंदरता का एक भाग जैसा था, बहुत ही चतुराई से किया गया। गाँव वाले जब भी उस खुशहाल दृश्य को देखते, उनकी रीढ़ में ठंडक दौड़ जाती और वे यह सोचकर डर जाते थे कि उनका नंबर कब आएगा।
एक दिन की शाम को, गाँव के युवा "फूल, पक्षी, हवा और चाँद" जैसी सुंदरता की तलाश में जंगल में निकल पड़े। वे उस रहस्यमय दृश्य का आनंद लेना चाहते थे, लेकिन शिकारी की उपस्थिति का आभास नहीं कर पाए। युवा फूल तोड़ने और पक्षियों की आवाज़ सुनने में लगे हुए थे। तभी, अंधेरे का शिकारी छाए हुए एक साए की तरह पास आया और उनके पीछे खड़ा हो गया।
अगली सुबह, गाँव वाले जंगल में पाए गए फूलों के गुच्छे को देखकर हतप्रभ रह गए। वह गुच्छा उन युवाओं के नाम की नाम पट्टिका के साथ रखा गया था, जिन्हें सभी जानते थे। गाँव वाले भय और दुःख के मारे काँपने लगे और फूल, पक्षी, हवा और चाँद की सुंदरता के पीछे छिपे भय को लेकर एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे। फिर, जब शिकारी का साया गायब हुआ, गाँव में एक खामोशी छा गई, और फूल वहीं खड़े रहे, जैसे शिकारी की ठंडी मुस्कान को छुपाने का प्रयास कर रहे हों।






































































































































































































