सारांश
एक दिन, एक ज्ञानी जो शहर में आया था, उसने उस भिखारी की चर्चा सुनी। ज्ञानी को चीजों की असली प्रकृति देखने की क्षमता के लिए जाना जाता था, और उसने भिखारी की पास मौजूद विशेष चीज़ में रुचि ली। ज्ञानी भिखारी के पास गया और उसके साथ बातचीत शुरू की।
ज्ञानी ने भिखारी से पूछा, "आप हर दिन थोड़ी-बहुत भिक्षा लेकर जीते हैं, क्या आपको कभी नाखुशी नहीं होती?" भिखारी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "मैं जीवन के लिए आभारी हूँ। मेरे कुछ दोस्त हैं और मैं हर दिन मजेदार कहानियाँ सुन सकता हूँ। इस शहर के लोग दयालु हैं, इसलिए मैं भाग्यशाली हूँ।"
उस उत्तर को सुनकर ज्ञानी प्रभावित हुआ और भिखारी से कहा, "अगर आप जैसे आभार का भाव रख सकें, तो आपको किसी चीज़ की कमी नहीं है। आप हम सबके लिए एक शिक्षक हैं।"
उसके बाद, ज्ञानी ने शहर के लोगों को भिखारी के हृदय की समृद्धि के बारे में बताया, और धीरे-धीरे भिखारी के पास कई लोग आने लगे और उसकी बातों को सुनने लगे। वह अब केवल एक भिखारी नहीं रहा, बल्कि लोगों को खुशी प्रदान करने वाला एक ज्ञानी बन गया।
शिक्षा
इस कहानी की शिक्षा है, "आभार का हृदय ही असली सम्पत्ति है।" भौतिक समृद्धि के बिना भी, आभार का भाव रखने से मन पूर्ण रहता है और दूसरे के लिए एक प्रकाश बन सकता है।

















































